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साधुत्व को मात्र एक विशिष्ट वेशभूषा में सीमित करना उचित नहीं है। वेशभूषा तो गौण है, साधुत्व की असली पहचान तो उसके विरक्ति आदि गुण हैं। इसीलिए कहा गया है- गुणेहिं साहू, अगुणेहिं असाहू, अर्थात् गुणों से ही साधुत्व होता है, अन्यथा असाधुत्व ही है। वैदिक व जैन-दोनों धर्मों में उक्त सत्य को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है।
(1)
नवि मुंडिएण समणो, न ओंकारेण बंभणो। नमुणी रण्णवासेणं, कुसचीरेण न तावसो॥
(उत्तराध्ययन सूत्र-25/31) - कोई सिर मुंडाने से ही श्रमण नहीं होता और न ओंकार का जप करने से कोई ब्राह्मण होता है। उसी प्रकार न वन में वास करने से कोई मुनि और न ही वल्कल-वृक्ष की छाल धारण करने से तापस' होता है।
(2)
मौनान्न मुनिर्भवति, नारण्यवसनान्मुनिः। स्वलक्षणंतु यो वेद, स मुनिः श्रेष्ठ उच्यते॥
(महाभारत, 5/43/60)
तृतीय वाई,427