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(2) अगाधे विमले शुद्धे, सत्य-तोये, धृति-हृदे। स्नातव्यं मानसेतीर्थे, सत्त्वमालम्ब्य शाश्वतम्॥
(महाभारत, 13/108/13) - सत्य रूपी अगाध, निर्मल और शुद्ध जल से भरे हुए, धैर्य रूपी सरोवर से युक्त मानस (मन रूपी) तीर्थ में सत्व-सद्गुणों का आलम्बन लेकर स्नान करना चाहिए।
(3) नोदक-क्लिन्न-गात्रस्तु, स्नात इत्यभिधीयते। सस्नाति यो दम-स्नातः, स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
(महाभारत, 13/108/9) - जिसका शरीर जल से केवल भीग गया, वह वस्तुत: स्नातस्नान किया हुआ नहीं कहा जा सकता। जो दम-संयम में स्नान करता है, वही बाहर से और भीतर से पवित्र है। ,
(4) वयसम्मत्तविसुद्धे पंचेन्दियसंजदे निरावेक्खे। ण्हाऊण मुणी तित्थे।
(बोध प्राभृत, 26) -व्रत व सम्यक्त्व से शुद्धता को प्राप्त, पंचेन्द्रियजयी व निरासक्त (आत्मा) ही तीर्थ है, उसमें स्नान करें।
(5) जाजले तीर्थमात्मैव।
(महाभारत, 12/255/36) - हे महर्षि जाजले! यह आत्मा ही तीर्थ है।
पीय सण्ड, 425