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__ स्नान दो तरह का होता है-शारीरिक व मानसिक या आध्यात्मिक। स्नान इसलिए किया जाता है ताकि शरीर पर संचित मैल को दूर किया जा सके। आध्यात्मिक स्नान भी आत्मा के पाप-मल को दूर कर उसे उज्ज्वलता प्रदान करता है। शारीरिक स्नान की अपेक्षा आत्मा रूपी तीर्थ में किये जाने वाले स्नान की श्रेष्ठता निर्विवाद है क्योंकि इससे बार-बार के देह-धारण से भी मुक्ति पाने का मार्ग प्रशस्त होता है। वैदिक व जैन-दोनों धर्मो में इस आध्यात्मिक स्नान की महती उपयोगिता मानी गई है और स्नान की विविध सामग्रियों का विविध तरीकों से निरूपण किया गया है।
(1) धम्मे हरए बंभे संति तित्थे, अणाविले अत्तपसण्णलेस्से। जहिंसिणाओ विमलो विसुद्धो, सुसीइभूओपजहामि दोसं॥
(उत्तराध्ययन सूत्र-12/46) -धर्म मेरा जलाशय है, ब्रह्मचर्य मेरा शान्ति-तीर्थ है, आत्मा की प्रसन्न लेश्या (उज्ज्वल परिणाम) मेरा निर्मल घाट है, जहाँ स्नान कर मैं मल-रहित और विशुद्ध होकर दोषों का त्याग करता हूँ।