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(2) विहाय कामान् यःसर्वान्, पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहङ्कारः, स शान्तिमधिगच्छति॥
(गीता-2/71) - जो पुरुष सब कामनाओं का त्याग कर, इच्छा, ममता और अहंकार से रहित होकर विचरता है, वही शान्ति पाता है।
(3) नकामभोगा समयं उति।
__(उत्तराध्ययन सूत्र-32/101) - काम-भोगों से शान्ति नहीं मिल सकती।
(4) न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्मेव भूय एवाभिवर्धते।
(महाभारत-1/65/50) - घी सींचने से जिस प्रकार अग्नि बढ़ती है, उसी प्रकार उपभोग से आत्म-शान्ति की जगह तृष्णा (और उससे उत्पन्न अशान्ति) और भी अधिक बढ़ती है।
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निष्कामता, निःस्पृहता व निरमिमानताये सुख,शान्ति की आधारशिलााएं हैं। कामभोगों के सेवन से शान्ति मिलती है-यह भ्रम है, अज्ञान है। वैदिक व जैन धर्म के उपर्युक्त शास्त्रीय उद्धरणों में उक्त विचारधारा का समान रूप से समर्थन हुआ है।
तृतीय खण्ड/421