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जीवन में सुख के दिन भी आते हैं तो दुःख के भी। उक्त सुखदुःख का कारण क्या है या इनका प्रदाता या नियामक कौन है- यह जिज्ञासा स्वाभाविक है। इसका समाधान वैदिक व जैन- दोनों धर्मों में किया गया है। जैन धर्म में स्वकृत कर्मों को ही सुख-दुःख का कारण माना गया है। वैदिक धर्म में भी, यद्यपि ईश्वर प्राणियों के सुख-दुःख का नियन्ता है, फिर भी वह प्राणियों द्वारा किये गये कर्मों के अनुरूप ही फल देता है - ऐसा माना जाता है। इस संदर्भ में, वैदिक व जैन- इन दोनों धर्मों के शास्त्रीय उद्धरण प्रस्तुत हैं जिनमें वैचारिक समता अभिव्यक्त होती है।
(1)
जयं चरे जयं चिट्ठे, जयमासे जयं सए । जयं भुंजतो भासतो, पावकम्मं न बंधइ ॥
( दशवैकालिक सूत्र - 4/8)
- जो साधक यतना- संयम या विवेक से चले, खड़ा हो, बैठे,
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सोए, खाए और बोले, उसके पाप कर्म का बंध नहीं होता ।
(2)
यत् करोषि यदश्नासि, यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय, तत्कुरुस्व मदर्पणम् ॥
तृतीय खण्ड/407