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(3) असतो मा सद्गमय।
(बृहदारण्यकोपनिषद्- 1/3/28) - मुझे असत् (मार्ग) से सत् (मार्ग) की ओर ले चलो।
(4)
उहिए नोपमायए।
(आचारांग सूत्र- 1/5/2)
- आत्मन् ! उठो, प्रमाद न करो।
(5) उत्तिष्ठत जाग्रत।
(कठोपनिषद्-3/14)
- उठो, जागो।
(6)
पमायं कम्ममाहंसु, अप्पमायं तहावरं।
(सूत्रकृतांग- 1/8/3) – प्रमाद कर्म (बन्धन) है, अप्रमाद अकर्म (बन्धन-निरोध) है।
(7) प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि। तथाऽप्रमादममृतत्वं ब्रवीमि॥
(महाभारत-5/2/4) - मैं प्रमाद को मृत्यु और अप्रमाद को अमरता कहता हूं।
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वर्तमान जीवन में ही भावी जीयन की रूपरेखा तैयार की जाती है। सन्मार्ग का आश्रयण, तथा सतत जागरूकता से भावी जीवन को प्रशस्त बनाया जा सकता है। उपर्युक्त उद्धरणों में वैदिक व जैनदोनों धर्मों की समान विचारधारा प्रवाहित होते देख सकते हैं।
जैन धर्म एतदिक धर्म की साकृतिक एकता/406