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__ (3) लोहो सव्वविणासणो।
(दशवैकालिक सूत्र-8/38)
- लोभ सब कुछ नष्ट कर देता है।
(4) अनर्थानामधिष्ठनमुक्तोलोभः पितामह !
(महाभारत - 12/159/1) - हे पितामह ! लोभ समस्त अनर्थों का अधिष्ठान (घर) है।
(5) जहा लोहो तहा लोहो, लाहा लोहो पवड्ढई।
__ (उत्तराध्ययन सूत्र-5/17) - ज्यों-ज्यों लाभ होता है, त्यों-त्यों लोभ होता है। लाभ से लोभ बढ़ता है।
(6) तथैव तृष्णा वित्तेन वर्धमानेन वर्धते।
(महाभारत- 12/276/7) - धन के बढ़ने के साथ ही तृष्णा भी बढ़ती है।
(7) दुक्खं हयं जस्स न होइ मोहो, मोहो हओ जस्स न होइ तहा। तण्हा हया जस्सन होइ लोहो, लोहो हओजस्सन किंचणाई॥
(उत्तराध्ययन सूत्र-32/8) - जो अकिंचन (अपरिग्रही) है, उसके लोभ नहीं होता। जिसके लोभ नहीं, उसकी तृष्णा नहीं होती। जिसकी तृष्णा नष्ट हो गई, उसका मोह भी नष्ट हुआ समझो। जिसके मोह नहीं रहा, वह दुःख से मुक्त हो गया।
तृतीय खण्ड/391