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किसी के द्वारा नहीं दिए गए 'परिग्रह' (आवश्यकता से अधिक संग्रह) को, अपने प्रमाद (मनोविकारों) के कारण, ग्रहण करना 'चोरी' ही है ।
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(6) तदेव हि धनं तस्य वपुर्वा सर्वथा मतम् ।
यद् यस्य शासनस्थानां यथा समुपयुज्यते ॥
(आ. जिनसेन - कृत हरिवंशपुराण - 18/147) - जिसका जितना धन या शरीर उसके अधीनस्थ (या साधर्मी) लोगों के उपयोग में आता है, उतने ही धन का या शरीर का वह व्यक्ति स्वामी कहलाने लायक है (अतिरिक्त का नहीं ) ।
(7)
यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम् । अधिकं योऽभिमन्येत, स स्तेनो दण्डमर्हति ॥
(भागवत पुराण-7/14/8) - जितने से अपना पेट भर जाए, उतनी मात्र संपत्ति पर प्राणियों का स्वत्व - अधिकार ( न्यायोचित ) है । जो उससे अधिक संपत्ति पर अपना अधिकार जताता है, वह चोर है, उसे दण्ड मिलना चाहिए।
(8)
रिपुः स्तेनः स्तेयकृद्दमेतु ।
(ऋग्वेद-7/140/10) - चोरी करने वाला (समाज का ) शत्रु है, उसका पतन हो ।
चोरी क्या है, इसके क्या आयाम हैं- इसकी व्याख्या सामाजिक हित के सन्दर्भ में की गई है । जैन व वैदिक-दोनों धर्मों के आचार्यों ने जो सूक्ष्मतम चिन्तन प्रस्तुत किया है, उसमें एकस्वरता स्पष्ट होती है।
तृतीय खण्ड/389