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(8) अश्रद्धामनृते दधात्, श्रद्धां सत्ये प्रजापतिः।
__ (यजुर्वेद-19177) – प्रजापति ने असत्य में अश्रद्धा और सत्य में श्रद्धा स्थापित
की है।
(9) मियं अदुटुंअणुवीय भासए। '
(दशवैकालिक सूत्र-7/55) -विचारपूर्वक मित-थोड़ा, अदुष्ट-निर्दोष-सुन्दर बोलना चाहिए।
(10) निर्दुरमण्यऽ ऊर्जा मधुमती वाक्।
_(अथर्ववेद-16/2/1) - निर्दोष, रमणीय, ओजस्वी और मधुर वाणी बोलें।
(11) सच्चं लोगम्मि सारभूयं।
(प्रश्रव्याकरणसूत्र-2/1)
- सत्य ही संसार में सारभूत है।
(12) एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
(ऋग्वेद-1/164/46) - सत्य एक है, उसे ज्ञानी बहुत प्रकार से बताते हैं।
तृतीय खण्ड/365