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परमेश्वर सत्-चित्-आनन्दमय है। उक्त 'सत्' रूप ही 'सत्य' है । इस प्रकार 'सत्य' ईश्वरीय रूप का प्रतिनिधित्व करता है। सत्य का अवलम्बन लेकर ईश्वरत्व के निकट पहुंचा जा सकता है। अतः 'सत्य' एक विशिष्ट धर्म है । ईश्वरीय उपदेश भी 'सत्य' रूप में ही अभिव्यक्त होता है। सत्य जनकल्याणकारी होता है । व्यवहार में जनहितकारी वचन को ही सत्य माना गया है। सत्य का आराधक परमेश्वर का आराधक है।
उपर्युक्त भारतीय सांस्कृतिक विचार-धारा वैदिक व जैन -इन दोनों तटों को छूती हुई प्रवाहित होती रही है।
(1)
तं सच्चखु भगवं ।
सत्य ही भगवान् है ।
(2)
सत्यमेवेश्वरो लोके ।
सत्य ही संसार में ईश्वर है ।
तृतीय खण्ड / 383
(प्रश्नव्याकरण सूत्र - 2/2)
(वाल्मीकिरामायण, - 2/109/13)