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ब्रह्मचर्य परम दुष्कर तप है, अत: वह सर्वश्रेष्ठ तप है। विषयभोगों में उच्छृखल रूप में प्रवृत्त हो रही इन्द्रियों पर नियन्त्रण किए बिना ब्रह्मचर्य की साधना सम्भव नहीं। विषय-भोगों के प्रति तृष्णा कभी शान्त नहीं होती, क्योंकि कामनाएं अनन्तानन्त हैं। यह तृष्णा परिणामतः दुःखप्रद ही होती है। इसलिए इस तृष्णा की भयंकरता को हृदयंगम कर, इन्द्रिय-विजय अर्थात् 'ब्रह्मचर्य की साधना पर अग्रसर होना ही श्रेयस्कर है। ब्रह्मचर्य बनाम कामभोग सेवन के सम्बन्ध में वैदिक व जैन-इन दोनों धर्मों में समान विचारों की बानगी प्रस्तुत है।
(1)
तवेसु वा उत्तमं बंभचेरं।
(सूत्रकृतांग सूत्र-1/6/23) - सभी तपों में सर्वोत्तम तप है- ब्रह्मचर्य।
(2) आश्रमेषु चतुर्बाहुः दममेवोत्तमं व्रतम्।।
(महाभारत-12/160/14) - चारों आश्रमों में 'दम' (इन्द्रिय-जय, ब्रह्मचर्य) को ही उत्तम व्रत माना गया है।
जैन धर्म एव वेदिक धर्म की सारकृतिक पता 380