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अहिंसा परम धर्म है। समस्त धर्माचार्यों के प्रवचन अहिंसाकेन्द्रित होते हैं। अहिंसा एक सर्वभौम या विश्व धर्म है क्योंकि यह प्राणिमित्र की इच्छा- जिजीविषा (जीने की इच्छा) से जुड़ा हुआ है। जैसे अपना जीवन प्यारा होता है, वैसे ही दूसरों को भी प्यारा है। अपने प्राणों की रक्षा की तरह दूसरे के प्राणों की रक्षा भी हमारा कर्तव्य है, क्योंकि हमारी जैसी आत्मा ही सब प्राणियों में है। इस प्रकार अहिंसा-दर्शन आत्मवत् दृष्टि के सिद्धान्त पर आधारित है। अभय-दान इसी अहिंसा धर्म के विविध रूपों में से एक है। वैदिक व जैन- इन दोनों धर्मों में अहिंसा-दर्शन को समानतया आदर प्राप्त हुआ है।
(1) सव्व-जग-जीव-वखण-दयळ्याए पावयणं भगवयासुकहियं।
(प्रश्नव्याकरण सूत्र-1) - भगवान् ने जगत् के सब जीवों की दया के लिए प्रवचन किया।
(2) अहिंसार्थाय भूतानां, धर्म-प्रवचनं कृतम्।
(महाभारत-109/12)
तीय राण्ड 377