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श्रद्धा आत्मा का दिव्य गुण है। इस गुण के विकास से ही 'सत्य' का साक्षात्कार व दर्शन हो पाता है। श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति ही 'ज्ञान' प्राप्त कर पाता है। श्रद्धाहीन व्यक्ति सन्देह व शंकाओं से ग्रस्त होकर भ्रमित होता रहता है- इस तथ्य को वैदिक व जैन दोनों धर्मों में समानतया स्वीकार किया गया है।
(1) सड्डी आणाए मेहावी।
(आचारांग सूत्र-1/3/4) - मेधावी अर्हत्-आज्ञा (सत्पथ) पर श्रद्धावान् होता है।
(2) श्रद्धया सत्यमाप्यते।
(यजुर्वेद-19/30)
- श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है।
(तीय सण्ड/373