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-राजन् ! इस संसार में एक धर्म के अतिरिक्त कोई और रक्षक
नहीं है।
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धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः।
(मनुस्मृति- 8/15) - धर्म हत (विनष्ट) होने पर, अपना विनाश (उल्लंघन) करने वाले को नष्ट कर देता है और धर्म रक्षित होने पर अपना पालन करने वाले की रक्षा करता है।
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वैदिक व जैन- इन दोनों धार्मिक परम्पराओं में धर्म की व्याख्या, प्रेरणा एवं फल की जो निरूपणा प्राप्त होती है, वह परस्पर पर्याप्त साम्य लिए हुए है।
तीय सातु 369