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है- अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः (गीता- 2/18)।
देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिः, धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
(गीता-2/13) -यह जो शरीरी (आत्मा) है, वह नित्य है, उसके जो देह हैं वे नाशवान् हैं। जिस प्रकार शरीर में कुमारावस्था आती है और चली जाती है, फिर युवावस्था आती है और चली जाती है, फिर वृद्धावस्था आती है और जाती है, उसी प्रकार मृत्यु के कारण प्राणी इस देह को छोड़कर नये देह में चला जाता है, धीर पुरुष (आत्मा की अमरता को ध्यान में रखते हुए) मोहित-दुःखी नहीं होता।
जैन परम्परा में भी आत्मा की अमरता व देह की नश्ववरता का प्रतिपादन कर मृत्यु-भय से निर्भीक रहने का परामर्श दिया गया हैसरीरं सादियं सनिधणं (प्रश्रव्याकरण- 1/2) अर्थात् शरीर का ही आदि व अन्त होता है। इमं सरीरं अणिचं (उत्तरा. 19/13)। अर्थात् यह शरीर अनित्य है। चइत्ताणं इमं देहं गंतब्बं (उत्तरा. 19/17)। अर्थात् इस (नश्वर) देह को छोड़कर जाना पड़ता ही है। सकम्मबीओ अवसं पयाइ, परं भवं सुंदर पावगं वा (उत्तरा. 13/24)। अर्थात् अपने कर्मनुरुप सुन्दर या निन्दनीय दूसरा जन्म धारण करना ही होता है।
समणं संजयं दन्तं हणेज्जा कोइ कत्थई। नास्थि जीवस्स नासुत्ति, एवं पेहेज संजए॥
(उत्तरा. 2/27) -संयत व जितेन्द्रिय श्रमण को कोई व्यक्ति मारे-पीटे व वध करे तो श्रमण को यह सोचना चाहिए कि आत्मा का कभी नाश नहीं होता (और इस प्रकार भयमुक्त रहे)।
उक्त सांस्कृतिक विचारधारा से मृत्यु-दर्शन से जुड़े सत्य का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। इस सत्य से सुपरिचित साधक नश्वर देह तथा भौतिक सुख-साधनों को नष्ट होते देखकर कभी विचलित नहीं होता। वह आसक्ति व व्यामोह से रहित हो जाता है।
____ उपर्युक्त मृत्यु-दर्शन को हृदयंगम करने वालों में वैदिक परम्परा के राजा जनक और जैन परम्परा के नमि राजर्षि- ये दोनों
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