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दिव्यास्त्र प्रदान किए। दैत्यराज बलि अपराजित हो गए। दैत्यों की भारी सेना के साथ बलि ने पुनः स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। देवों की पराजय के प्रति देवगुरु बृहस्पति ने देवों को युद्ध न करने की सम्मति दी। देवता भाग गए। स्वर्ग पर पुनः बलि का अधिकार हो गया।
सौ अश्वमेध यज्ञ पूर्ण किए बिना कोई नियमित इन्द्र नहीं बन सकता, यही विचार करके शुक्राचार्य ने बलि से अश्वमेध यज्ञ कराने प्रारंभ कर दिए।
देवमाता अदिति अपने पुत्रों की दुर्दशा पर अत्यन्त क्षुब्ध थी। वह अपने पति-महर्षि कश्यप के पास पहुंची और अपना दुःख निवेदन किया। महर्षि ने अदिति को भगवान् की आराधना करने को कहा। अदिति ने वैसा ही किया।
भगवान विष्णु प्रगट हुए। उन्होंने कहा-"अदिति! बलि धर्मात्मा और ब्राह्मणभक्त है। उसे दण्ड नहीं दिया जा सकता है। लेकिन मेरी आराधना कभी निष्फल नहीं जाती है। मैं ऐसा यत्न करूंगा कि तुम्हारे पुत्रों का खोया हुआ वैभव उन्हें पुनः प्राप्त हो जाए।"
भगवान् विष्णु अदिति के उदर से वामन रूप में अवतरित हुए। महर्षि काश्यप ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार किया। वामन रूपी विष्णु हाथ में छत्र, पलाशदण्ड और कमण्डलु लेकर नर्मदा के तट की ओर चले, जहां दैत्येश्वर बलि सौवां अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। उस अत्यन्त तेजस्वी वामन ने यज्ञशाला में प्रवेश किया।
बलि वामन को देखकर गदगद हो गए। भलीभांति स्वागत करके तथा सिंहासन पर बैठाकर बलि ने वामन के चरण धोए। फिर करबद्ध होकर बोले
“वामनदेव! अपने आगमन का उद्देश्य बताकर मुझे कृतार्थ कीजिए।" "मैं कुछ पाने की आशा से तुम्हारे पास आया हूं!” वामन बोले- "क्या मेरी आशा सफल होगी?"
"अवश्य वामनदेव!'' बलि बोले- "आदेश कीजिए। त्रिलोक का साम्राज्य आपके चरणों में अर्पित है।"
“अकिंचन ब्राह्मण को तीन लोक का साम्राज्य नहीं चाहिए।" वामन ने कहा- "मुझे केवल तीन कदम भूमि चाहिए।"
जैन धर्म एवं उदिक धर्म की सास्कृतिक एकता 346)> e