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[१] वर्षमान की भ्रातृभक्ति
(जैन) भगवान् महावीर जैन धर्म के अन्तिम तीर्थंकर थे। वे जन्मजात तीन ज्ञान (मति-श्रुत-अवधि) के धनी थे। पूर्व जन्मों की महान साधना के फलस्वरूप उन्होंने सर्वोच्च गोत्र- तीर्थंकर गोत्र का अर्जन किया था।
__ महावीर का जन्म का नाम वर्धमान था। वर्धमान जब माता त्रिशला के गर्भ में थे, उस समय गर्भ-भार के कारण माता को कष्ट होने लगा। गर्भस्थ शिशु-वर्धमान ने माता की पीड़ा को अनुभव किया। उन्होंने अंगसंचालन रोक दिया। माता की पीड़ा समाप्त हो गई। परिवार के पूज्य/ ज्येष्ठ सदस्यों के प्रति वर्धमान का जो आदर या भक्तिभाव है, उसका प्रारम्भिक रूप उक्त घटना में अभिव्यक्त हो गया था।
प्रभु का जन्म हुआ। युवा हुए। माता-पिता की हर खुशी का उन्होंने ध्यान रखा । इसीलिए विवाह भी रचाया । प्रभु जब अट्ठाईस वर्ष के हुए तो अत्यल्प समय में उनके माता-पिता स्वर्ग सिधार गए। वर्धमान का संकल्प पूर्ण हुआ। वर्धमान के बड़े भाई नन्दीवर्धन थे। गृहत्याग के लिए उनकी आज्ञा भी आवश्यक थी। एक दिन वर्धमान ने अपने मन के भाव नन्दीवर्धन से कहते हुए उनसे दीक्षा की अनुमति चाही
“भाई! मेरा लक्ष्य मुझे पुकार रहा है। मुझे गृह-त्याग कर अगृही- अणगार होना है। मुझे दीक्षा की अनुमति प्रदान कर दो।'
___ "वर्धमान!” विह्वल होकर नन्दीवर्धन बोले- "भाई! क्या कह रहे हो! अभी तो माता-पिता का वियोग हुआ है और अभी तुम मुझसे दूर जाने की बात कह रहे हो। नहीं, वर्धमान! तुम्हारा विरह मैं सह नहीं पाऊंगा।"
"पूज्य अग्रज!' वर्धमान बोले- “यह तो मेरी नियति है। नियति को ठुकराया नहीं जा सकता है। कम से कम गृहवास की एक सीमा तो तय कर दो!”
“दो वर्ष!'' नन्दीवर्धन बोले- "भाई! दो वर्ष तक मुझे छोड़कर जाने की बात मत करना।"
वर्धमान ने भाई के आदेश के समक्ष मस्तक झुका दिया।
द्वितीय खण्ड/327