________________
मिलइ न जगत सहोदर धाता।
अर्थात् (लक्ष्मण जैसे) सहोदर भाई बारबार (एवं सभी को) नहीं मिला करते।
जथा पंख विनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिवर करहीना॥ अस मम जिवन बंधु विनु तोही।
जो जड़ दैव जिआवै मोही॥
- अर्थात् जड़ भाग्य यदि मुझे लक्ष्मण के बिना भी जीवित रखे तो मेरा जीवन उसी तरह शोभाहीन व निष्प्राण होगा जिस प्रकार पंख के बिना पक्षी का, मणि के बिना सर्प का, सूंड बिना हाथी का (जीवन) होता है।
वाल्मीकि रामायण में भी राम अपने भाई लक्ष्मण के विषय में इस प्रकार अपने भाव अभिव्यक्त कर रहे हैं:- शक्या सीतासमा नारी, सर्वलोके विचिन्वता। न लक्ष्मणसमो धाता, सचिवः साम्परायिकः (वा.रामा. 6/49/6)। अर्थात् समस्त लोक में ढूंढने निकलूं तो शायद सीता जैसी नारी तो मिल सकती है, किन्तु लक्ष्मण जैसा युद्धकुशल व सहयोगी भाई नहीं मिल सकता।
वैदिक परम्परा की तरह जैन परम्परा में भी भात-प्रेम के आदर्श को मान्यता दी गई है। पुराणकार जैनाचार्य जिनसेन ने स्पष्ट कहा हैगुरोरसंनिधौ पूज्यः ज्यायान् भाताऽनुजैरिति।
(आदिपुराण- 34/92) - अर्थात् पिता (गुरु) के न रहने पर, छोटे भाइयों को चाहिए कि ज्येष्ठ भाई को पूज्य समझे । उपर्युक्त वैचारिक व सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में जैन व वैदिक- इन दोनों विचारधाराओं से जुड़े कुछ कथानकों का चयन कर यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।
वर्धमान महावीर का प्रथम कथानक जैन परम्परा से सम्बद्ध है तो भरत और लक्ष्मण के कथानक वैदिक परम्परा से लिये गये हैं। इन सभी कथानकों में आदर्श भ्रातृप्रेम के भारतीय पारिवारिक वातावरण का चित्रण हुआ है जो आज सभी के लिए प्रेरणास्पद है।
जैन धर्ग एवं दिक धर्म की सांस्कृतिक एकता 326