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माता-पिता के लाड़-प्यार में अरणक युवा हुआ। वह बहुत सुकुमार था। धूप की तपिश और सर्दी की ठिठुरन तक का उसने कभी अनुभव नहीं किया था । कष्ट क्या होता है- वह नहीं जानता था।
जैन मुनि मित्राचार्य ग्रामानुग्राम धर्म का संदेश देते हुए एक बार तगरा नगरी में पधारे। मुनि-वन्दन- दर्शन-प्रवचन-श्रवण के लिए पूरी नगरी उमड़ पड़ी। दत्त, भद्रा और अरणक भी मुनि के पास गए। वन्दन कर बैठे। मुनि ने देशना दी। देशना ने उन तीनों की आत्मा को छू लिया। लौकिक सम्पन्नता को ठुकरा कर दत्त-भद्रा तथा अरणक अलौकिक आध्यात्मिक सम्पन्नता को पाने के लिए दीक्षित हो गए।
पिता और पुत्र, दत्त मुनि तथा अरणक मुनि साथ-साथ विचरण करते थे। पिता का ममत्व भाव पुत्र पर पूर्ववत् बना रहा। दत्त अरणक का पूरा ध्यान रखते । स्वयं गोचरी लाते । मुनिचर्या के अन्य छोटे-बड़े कार्य भी वे स्वयं करते। मुनि बनकर भी अरणक की सुकुमारता ज्यों की त्यों रही। इसीलिए अरणक दीक्षित होकर भी श्रमणत्व को आत्मसात् न कर सके। श्रम के अभाव में उनमें मुनि के लिए अपरिहार्य-कष्टसहिष्णुता को विकसित नहीं होने दिया।
समय प्रत्येक मर्ज की दवा है। एक दिन दत्त मुनि का देहान्त हो गया। अरणक को श्रमण चर्या का समस्त श्रम स्वयं करना पड़ा। जलती दोपहर में अरणक भिक्षा के लिए निकले । गर्मी ने उनका हाल बेहाल कर दिया। बदन पसीने से तरबतर हो गया। अत्यन्त सुकुमार उस युवक मुनि को चलना कठिन हो गया।
अरणक एक भवन की छाया में खड़े होकर पसीना सुखाने लगे। उस भवन की स्वामिनी पति-वियोग से व्यथित थी। सहसा उसकी दृष्टि मुनि पर पड़ी। मुनि की सुकुमारता पर वह विमुग्ध हो उठी । उसने एक दासी को भेजकर मुनि को बुला लिया।
गृहस्वामिनी महिला ने अत्यन्त प्रीति-पूर्ण वचनों से मुनि का स्वागत किया। कामाकुल हाव-भाव दर्शाते हुए वह बोली- “मुने! इस भवन को अपकी चरण-धूलि ने पावन कर दिया है। आप यहां रहिए। आपको यहां कोई कष्ट न होगा।'
जैन धर्म एतं वैदिक धर्म की सांस्कृतिक एकता/310