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प्रायश्चित
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(सांस्कृतिक पृष्ठभूमिः)
राग बन्धन है, विराग मुक्ति है। राग संसार से जोड़ता है और विराग संसार को तोड़ता है। राग-रंग में रंगी आंख परमात्मा की ओर से मुंद जाती है जबकि रागातीत-रागरंग से असम्पृक्त आंख संसार की ओर से मुंद जाती है। राग और विराग- ये दो विपरीत दिशाओं के दो छोर हैं।
राग का अर्थ है- पदार्थ में आसक्ति और विराग का अर्थ है पदार्थ में अनासक्ति। रागासक्त चित्त नश्वर-परिवर्तनशील पदार्थ में आनन्द खोजता है, जबकि विरागी चित्त परमात्मा की खोज में परमानन्द अनुभव करता है। रागासक्त चित्त की खोज सदैव अधूरी रहती है और उसे पुनः पुनः पश्चात्ताप की ज्वाला में जलना पड़ता है क्योंकि सुखाभास को सुख स्वीकार कर लेना अन्ततः कस्तूरी के मृग की बाह्य दौड़ ही सिद्ध होती है। विरागी चित्त की खोज का परमात्मा पर अन्त होता है। उसे परमानन्द उपलब्ध होता है।
भारतीय संस्कृति की दोनों (जैन व वैदिक) विचारधाराएं इस तथ्य पर सहमत है कि राग से व्यक्ति संसार में बंधता है और वैराग्य व वीतरागता से मुक्ति प्राप्त करता है। वैदिक परम्परा के आचार्य शंकर ने कहा है- मोक्षस्य हेतुः प्रथमं निगद्यते, वैराग्यमत्यन्तम- नित्यवस्तुषु (विवेकचूड़ामणि-71)। अर्थात् अत्यन्त नश्वर वस्तुओं के प्रति वैराग्य ही मोक्ष का प्रथम कारण है। जैन परम्परा में भी कहा गया है- रत्तो बंधदि
द्वितीय खण्ड /307