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3तप का अहंकार
- (सांस्कृतिक पृष्ठभूमिः)
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अहंकार पतन का कारण है। अहंकार तपस्वियों के तप, ज्ञानियों के ज्ञान और ध्यानियों के ध्यान के रस को पी जाता है। वह उन्नति के मग की दीवार है, परन्तु अवनति के भग का द्वार है। अहंकार ही वह मूल बाधक तत्त्व है जो आत्मतल पर परमात्मता के फूल विकसित नहीं होने देता है।
जैन, वैदिक तथा अन्यान्य सभी धर्मग्रन्थों में तप की महत्ता का मुखर गान हुआ है, लेकिन तप में अहं को तप की गरिमा का शोषक कहा गया है। तप भी एक अग्नि है और अहंकार भी एक अग्नि है। तप की अग्नि संचित कर्म समूह को नष्ट करती है। लेकिन यदि उस तप के साथसाथ अहंकार चलता है तो वह तप को जलाता रहता है। यही कारण है कि तप निष्फल हो जाता है। आत्मा परमात्मत्व को उपलब्ध नहीं हो पाती। नर नारायण से नहीं मिल पाता। दोनों के मध्य अहंकार दीवार बन जाता है। दादू दयाल ने हृदय रूपी महल को अत्यन्त बारीक बताते हुए कहा था कि उसमें परमात्मा और अहंकार एक साथ नहीं रह सकते हैं
जहां राम तहां मैं नहीं, मैं तहां नहीं राम। दादू महल बारीक है, द्वै को नां ही ठाम॥
अहंकार तप का अजीर्ण है। वह तप को जीर्ण-नष्ट कर देता है। विनम्रतापूर्वक अल्प तप भी बड़ा शुभ परिणाम देता है।आत्मा में परमात्मा और नर में नारायण का द्वार खोल देता है।
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सिीय गण्ड/283
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