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सम्यग्ज्ञान अथवा विवेक का जब भी प्रादुर्भाव होता है, तभी विरक्ति के अंकुर फूट पड़ते हैं।
वैदिक परम्परा के विश्रुत ज्ञानी शुकदेव पूर्व जन्म में गृहीत ज्ञान के परिणाम स्वरूप 'काम' से अछूते रहे। संसार में जन्म लेकर भी, वे आजीवन विरक्त रहे। उनकी निःस्पृहता भरे यौवन में भी अक्षुण्ण रही। यही कारण था कि नारियां उन्हें देखकर संकोच या भय से उन्मुक्त रहती थीं। कमल-सरोवर में स्नान करती देवबालाओं को युवा शुकदेव का उधर से गुजरना संकोची न बना सका।
___ जैन परम्परा में भी जम्बू स्वामी जैसे आचार्य हुए हैं, जिन्हें भरी जवानी एवं कामभोग के उपलब्ध विशिष्ट साधन विरक्ति से रोक न सके।
शुकदेव और जम्बू स्वामी के कथानक इस तथ्य को पृष्ट करते हैं कि युवावस्था भी विरक्ति में बाधा नहीं बनती, और विरक्ति किसी भी वय में उत्पन्न हो सकती है।
जैन धर्म एवं चैदिक धर्ग की सांस्कृतिक एकता/282)>
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