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यहां भारी धन आया है। उसने साथियों के साथ उस धन को चुराने के लिए प्रस्थान कर दिया। उसने अवस्वापिनी विद्या से पूरे नगर को सुला दिया। उसने बेहिचक ऋषभदत्त सेठ के घर में प्रवेश किया। चोरों ने धन की गठरियां बांधनी शुरू कर दी।
प्रभव की दृष्टि सुहाग कक्ष पर पड़ी। उसने देखा कि एक ध्यानस्थ युवक को आठ सुन्दर कन्याएं रिझाने का असफल प्रयास कर रही हैं। उसे आश्चर्य हुआ कि उसकी अवस्वापिनी विद्या यहां निष्प्रभावी हो गई। वह तत्काल मुड़ा। साथियों से बोला- “तत्काल धन लेकर चलो।" लेकिन आश्चर्य! पांच सौ ही चोरों के पैर जहां के तहां चिपक गए। प्रभव को लगा कि अवश्य ही इस ध्यानस्थ युवक ने मेरे साथियों के पैर बांध दिए हैं।
आठों श्रेष्ठी-कन्याओं ने एक-एक उदाहरण के माध्यम से जम्बूकुमार को समझाना चाहा।लेकिन जम्बूकुमार ने उन आठों के उदाहरणों का खण्डन करके और आठ ही दृष्ठान्तों से अपने पक्ष का मण्डन करके उनके हृदयों में भी विरक्ति के बीज बो दिए। आठों ने अपनी हार स्वीकार कर ली। भोग और योग के इस द्वन्द्व में भोग पराजित हो गया । योग को जय मिली। निष्कामचेता जम्बूकुमार ने काम-वासना से संतप्त हृदयों में साधना की उमंग जगा दी।
"रूप और धन प्रभूत मात्रा में पाकर भी यह युवक अनासक्त है। इसका अर्थ है कि रूप और धन के अतिरिक्त भी कुछ बड़ा है जिसे पाकर यह सब व्यर्थ हो जाता है। प्रभव ऐसा सोचते हुए प्रार्थित स्वर में जम्बू से बोले- “कुमार! हमारे अपराध को क्षमा करो और हमें भी उस परम रूप और परमधन से परिचित कराओ जिसे पाकर यह पौदगलिक रूप और धन निःसार हो जाता है।"
जम्बू ने चोरों को संयम का मर्म समझाया। पांच सौ ही चोर विरक्त हो गए। दूसरे दिन जंबूकुमार, उनके माता पिता, आठों पत्नियों, उनके माताओं-पिताओं, पांच सौ चोरों तथा प्रभव-यों पांच सौ अट्ठाईस भव्यात्माओं ने संयम ग्रहण किया। काम-विजेता जम्बू न केवल स्वयं, अपित हजारों भव्यात्माओं के लिए कल्याण का द्वार सिद्ध हुआ। [कल्पसूत्र की कल्पदुमकलिका व्याख्या से]
शिणीय खण्ड/277