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विरक्तचित्त भर्तृहरि ने वैराग्य की महिमा का सुन्दर चित्र खींचते हुए कहा थाभोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयम्, माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम् । शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद् भयम्, सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ॥ (वैराग्यशतक, 31)
- भोग में रोग का भय है, कुल में आचारभ्रष्टता का भय है, धन में राजा का भय है, अभिमान में दीनता का भय है, सामर्थ्य में शत्रु भय है, सौन्दर्य में वृद्धावस्था का भय है, शास्त्रज्ञान में तर्कशील विवादी का भय है, गुण में दुष्ट का भय है और शरीर में यमराज का भय है । इस संसार में सभी वस्तुएं भययुक्त हैं, वैराग्य ही अभय है ।
जब कोई व्यक्ति ज्ञान को उपलब्ध हो जाता है तब उसमें विरक्ति का भाव जागृत होता है। ज्ञान और काम विपरीत ध्रुव हैं। दोनों का अस्तित्व एक साथ नहीं हो सकता। काम है ज्ञान का अभाव । ज्ञानसूर्य के उदय होते ही हृदय से काम का अन्धकार विलीन हो जाता है । दादू जी की भाषा में
जहां राम तहां काम नहीं, काम जहां नहीं राम । दादू महल बारीक है, दूजे को नहीं ठाम ॥
शुकदेव, जम्बूस्वामी- इन दोनों कथानकों को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है जिनमें एक सांझा उपदेश सन्निहित है कि वैराग्य-साधना हेतु कोई वय-विशेष नियत नहीं होता । जब ही अन्तर्ज्योति जागृत होती है, विरक्ति का द्वार उद्घाटित हो जाता है।
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जम्बू स्वामी (जैन)
राजगृह नगर में ऋषभदत्त नाम के एक सेठ रहते थे । उनकी पत्नी का नाम धारिणी था । उनके एक पुत्र था जिसका नाम जम्बूकुमार था । जम्बूकुमार सर्वगुणसम्पन्न और योग्य था । यौवनावस्था में आठ बड़े सेठों ने अपनी-अपनी कन्याओं का सम्बन्ध जम्बूकुमार से तय कर दिया ।
द्वितीय खण्ड/ 275