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हो गए थे । यावचपुत्र को लौकिक घटना से विरक्ति हुई और वे अमृतत्व की प्राप्ति में अग्रसर हो गए।
सभी बालसाधक अपनी-अपनी परम्परा के विशिष्ट और लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं । अद्भुत बात यह है कि अतिमुक्त मात्र 8 वर्ष का है, और ध्रुव 5 वर्ष का ही । थावर्चापुत्र व नचिकेता भी बहुत छोटी आयु के हैं। प्रश्न है - इतनी छोटी आयु में उन्होंने ज्ञान प्राप्त कैसे कर लिया ? पूर्वजन्म की साधना के संस्कार लेकर आए इन बालकों को जब वैराग्य का कोई निमित्त मिला तो उनका ज्ञान जागृत हो गया । गौतम स्वामी का निमित्त पाकर अतिमुक्त का, और माता का निमित्त पाकर ध्रुव को वैराग्य जागृत हुआ । लौकिक घटना का निमित्त पाकर थावर्चापुत्र को वैराग्य जागृत हो गया था । नचिकेता को तो जन्मजात जिज्ञासा थी जिससे सांसारिक विषयों की अपेक्षा परम रहस्यों को जानने की रूचि अधिक थी। चारों को प्रलोभन दिया गया । अतिमुक्त को राज्य का, तथा ध्रुव को नारद व स्वयं विष्णु द्वारा प्रलोभन दिया गया, इसी तरह थावर्चापुत्र को श्रीकृष्ण ने और नचिकेता को यमराज ने प्रलोभन दिए परन्तु वे सभी अडोल रहे। परिणामतः, चारों अपनेअपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रहे ।
जैन धर्म एवं वैदिक धर्म की सांस्कृतिक एकता / 272)