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_ "मृत नहीं तो क्या जीवित है तुम्हारा भाई?' देव ने सुमधुर स्वर से कहा- “मेरे अभिन्न मित्र! मोह की कारा से स्वतंत्र बनकर सोचो कि तुम्हारे भाई ने छः माह से न भोजन खाया है और न जल पीया है। इतना ही नहीं, उसने सांस तक नहीं लिया है। जो न खाए, न पीए और न ही श्वास ले, वह जीवित कैसे हो सकता है? प्रतिबुद्ध बनो मेरे मित्र! देह के साथ मृत्यु का सम्बन्ध अखण्ड है। विगत का शोक त्यागो । आगत के प्रति सावधान बनो।"
मित्र देव की युक्ति सफल हो गई। बलराम एक बार पुनः जी भर कर रोए। तत्पश्चात् भाई के शव का अग्नि-संस्कार करके आत्म-साधना करने के लिए वनों में चले गए।
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मोह से सम्बन्धित ये कथायें मोहग्रस्त व्यक्तियों की पीड़ा को अभिव्यक्त कर रही हैं। प्रश्न है- पीड़ा का मूल कारण क्या है? जैन और वैदिक धर्मशास्त्र पीड़ा का कारण मोह को मानते हैं। सगर चक्रवर्ती, बलराम आदि के कथानक इसी तथ्य को इंगित करते हैं।
- जैन साहित्य से अवतरित सगर चक्रवर्ती का कथानकसाठ हजार पुत्रों की एक ही दिन में हुई मृत्यु ने सगर के मोहसिक्त हृदय को हाहाकार से भर दिया। षट्खण्ड का विशाल साम्राज्य उन्हें शूल-सा प्रतीत होने लगा। वृद्ध ब्राह्मण की युक्ति ने सगर का मोह खण्डित किया। मोहशिला के खण्डित होते ही मोक्ष के परमानन्द की मधुरसलिला महागंगा उनके हृदय-तल पर अवतरित हो गई।
-वैदिक परम्परा के कथानक में देव की युक्ति ने बलराम जी के मोह को तोड़ा तो वे आत्मकल्याणार्थ वन को प्रस्थित हो गए।
-बौद्ध कथा- गौतमी का मोह भगवान बुद्ध की युक्ति से खण्डित हुआ। वह बोधि की प्यास से भर गई। संबोधि उपलब्ध कर सिद्ध हुई।
-पारसी परम्परा के धर्मगुरु के मोह-भंग की युक्ति निकाली उनकी धर्मपत्नी ने। विभिन्न धर्म-संस्कृतियों से बही यही समान स्वरसरिता धर्म की अखण्ड एकात्मकता की परिचायिका है। .
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