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________________ अनुयायियों को मोह के विषय में कहा था- मोहं भिक्खवे! एमधम्म पजहथ, अहं वो पाटिभोगो अनागामितायाः (सुत्तपिटक, इतिवृत्तक, 1/3)। अर्थात् हे भिक्षुओं! एक मोह को छोड़ दो, मैं तुम्हारे अनागामी अर्थात् निर्वाण का उत्तरदायित्व लेता हूं। वैदिक परम्परा में भी माना गया है कि 'मोह' से रहित होने पर ही कल्याण-मार्ग प्रशस्त हो पाता है। वैदिक ऋषि का वचन हैअप्रभूरा महोभिः व्रता रक्षन्ते विश्वाहा (ऋग्वेद- 1/90/2)। अर्थात् मोह से मूर्छित न होने वाले ज्ञानी पुरुष ही अपने आत्मीय तेज से सदैव व्रतों में दृढ़ रहते हैं। गीता में कहा गया है कि मोह एक तामसी वृत्ति है (गीता14/13), और तामसी प्रवृत्ति अधोगति का कारण होती है (गीता- 14/ 18)। मोहग्रस्त व्यक्ति मुक्ति से दूर ही रहता है, इसी सत्य को रेखांकित करते हुए गीता में कहा गया है- मोहाद् गृहीत्वाऽसद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः (गीता- 16/10)। अर्थात् मोहग्रस्त व्यक्ति असत् सिद्धान्तों को अपनाते हैं और भ्रष्ट आचरण में संलग्न हो जाते हैं, इसलिए वे संसार में ही घूमते रहते हैं- मुक्त नहीं हो पाते। मोह का क्षय संसार का क्षय है। वस्तुतः संसार का अस्तित्व बाहर नहीं, भीतर में है। भीतर का संसार मिटते ही, बाह्य संसार स्वतः मिट जाता है। अन्तःसंसार के शेष रहते, बाह्य संसार मिट नहीं सकता है। फिर भले ही एकान्त कानन में बैठकर समाधि का अभ्यास किया जाए या सुदीर्घ तपस्याएं की जाएं। अमोह है-वीतरागता का आत्मतल पर अवतरण । मोह के क्षय के क्षण के साथ ही, आंसू-पीड़ा व बन्धन स्वतः क्षीण हो जाते हैं। निम्नलिखित कथानकों में यही सत्य-स्वर अनुगुञ्जित हो रहा है। [१] सगर चक्रवर्ती (गैन) - अयोध्या नगरी में राजा विजय का राज्य था। उनकी रानी का नाम विजया था। राजा विजय के एक भाई थे, जिनका नाम सुमित्र था। सुमित्र की रानी का नाम यशोमती था। विजया और यशोमती ने चौदह जनाए गमिक पर्ग की सरकारिक एकता/252 >c
SR No.006297
Book TitleJain Dharm Vaidik Dharm Ki Sanskrutik Ekta Ek Sinhavlokan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSubhadramuni
PublisherUniversity Publication
Publication Year2008
Total Pages510
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size31 MB
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