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भोगता है। इस दृष्टि से भारतीय संस्कृति के पुरोधा आचार्यों ने एक स्वर से कामभोगों की हेयता का प्रतिपादन किया है। कामनाओं की पूर्ति कभी हो ही नहीं सकती, क्योंकि कामना का कहीं अन्त नहीं होता। इस सम्बन्ध में वैदिक व जैन परम्परा के विचार-साम्य की दृष्टि से दो उद्धरण यहां प्रासंगिक हैं
(वैदिक): पृथिवी रत्नसम्पूर्णा हिरण्यं पशवः स्त्रियः। नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् ॥
(महाभारत, 1/75/51) (जैन): पुढवी साली जवा चेव, हिरण्णं पसुभिस्सह। पडिपुण्णं णालमेगस्स, इइ विजा तवं चरे॥
(उत्तराध्ययन सूत्र-9/49) उपर्युक्त दोनों उद्धरणों का कथ्य एक ही है, वह यह है कि दुनिया की सारी धरती, सारी भौतिक सम्पति भी मिलकर किसी एक व्यक्ति की कामना को संतुष्ट नहीं कर सकतीं, इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि वह तप या शान्ति (संतोष) का आश्रय ले।
निष्कर्ष यह है कि कामभोगों की निःसारता और उनकी हेयता के विषय में समस्त भारतीय विचारधाराएं (चार्वाक का छोड़ कर) एकमत हैं। उपर्युक्त कथानकों मेंजो जैन व वैदिक- दोनों धाराओं से सम्बद्ध हैं- एक स्वर से कामभोगों की हेयता का सोदाहरण प्रतिपादन हुआ है।
जैन परम्परा से सम्बद्ध ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के कथानक में असामान्य विशाल वैभव का स्वामी चक्रवर्ती ब्रह्मदत्त विषयभोगों के दलदल में फंसता ही गया और आजीवन असंतुष्ट ही रहा । संतुष्टि न होने का प्रमाण यही है कि वह उससे विरत नहीं हुआ। भोजन से किसी व्यक्ति का पेट भर गया है- इसकी पुष्टि तब होती है जब वह
दिया तार 15