________________
यथाक्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति, तथैव प्रेत्य भवति (छान्दोग्य उप 3/14/1)- इस लोक में जो जैसा कर्म करता है, परलोक में भी वैसा ही फल पाता है।
सन्त वलसीदास ने भी कर्म-सम्बन्धी सनातन मान्यता को रामचरित मानस में इस प्रकार रेखांकित किया है :
कर्मप्रधान विश्व करि राखा।
जो जस करइ, सो तस फल चाखा।।
निस्कर्ष यह है कि 'कर्म-फल टारै न टरै' की मान्यता को सभी भारतीय धार्मिक परम्पराओं ने मान्य किया है। जिन धर्मों और दर्शनों में सृष्टिनियन्ता ईश्वर भी मान्य है तो भी यह माना गया है कि ईश्वर जीवों को उनके कर्मों के अनुसार फल देते हैं।
कर्म-सिद्धान्त को पौराणिक कथाओं में भी व्याख्यायित करने का प्रयास हुआ है। उपर्युक्त वैचारिक पृष्ठभूमि के परिप्रेक्ष्य में वैदिक व जैन- इन दो परम्पराओं में से एक-एक कथानक यहां उद्धृत कर प्रस्तुत किये गए हैं:
व तह/
[१] कलावती
(जैन)
कलावती देवशाल नगर के राजा विजयसेन की पुत्री थी। कलावती का एक भाई था- जयसेन । बहन-भाई में अतिशय प्रीति थी। कलावती में रूप और गुणों का अपूर्व संगम हुआ। उसके रूप और गुणों की सुगन्ध दूर देशों में व्याप्त हो गई थी। अनेक राजा और राजकुमार उसे अपनाने को उतावले थे।
शंखपुर का राजा शंख कलावती के रूप पर सर्वाधिक मोहित था। उसे ज्ञात हुआ कि कलावती का स्वयंवर होने वाला है। उस स्वयंवर में कलावती उसे ही वरमाला पहनाएगी जो उस द्वारा पूछे गए चार प्रश्नों के सही उत्तर देगा। राजा शंख ने सरस्वती देवी की आराधना की। देवी ने प्रगट
< जैन धर्म एवं वैदिक धर्म की सांस्कृतिक एकता/2362