SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 260
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ फल मिलता है। वर्तमान में जीव जो दुःख-सुखादिक फल भोग रहा है, वह भी पूर्वकृत कर्मों का ही फल है- जीवेण सयं कडं दुक्खं वेदेइ, न परकडे (भगवती सूत्र 1/2)। - अर्थात् जीव जो भोग रहा होता है, वह अपने ही किये हुए कर्म का फल होता है, किसी दूसरे का किया हुआ नहीं। किये हुए कर्म सदा साथ रहते हैं, उसे छोड़ते नहीं - कत्तारमेव अणुजाणइ कम्मं (उत्तरा. सू. 13/23) - अर्थात् कर्म अपने कर्ता का सदैव अनुगमन करते हैं । कर्म-सम्बन्धी उक्त जैन मान्यता का बौद्ध परम्परा में भी समर्थन प्राप्त होता है। बौद्ध साहित्य में उपलब्ध कुछ उद्धरण यहां प्रस्तुत किये जा रहे हैं:- कम्मणा वत्तते लोको (सुत्तनिपात, 3/35/61) । – समस्त लोक कर्म-सिद्धान्त से प्रवर्तित है । यं करोति नरो कम्मं कल्लाणं यदि पावकं । तरस तस्सेव दायादो यं यं कम्मं पकुव्वतो ॥ (थेरगाथा - 147) - मनुष्य पाप या पुण्य जो भी करता है, उसी के अनुरूप वह बुरा या अच्छा फल पाता है । न हि नरसति कस्स वि कम्म (सुत्तनिपात, 36/10)- किसी का किया हुआ कार्य (फल देने से पूर्व) नष्ट नहीं होता । यं करोति तेण उपपज्जति (मज्झिमनिकाय, 2/7 / 2) - प्राणी जो कर्म करता है, वह अगले जन्म में उसे साथ लेकर जाता है। वैदिक परम्परा में भी उक्त सिद्धान्त का ही प्रतिपादन हुआ है । महाभारतकार व्यास महर्षि ने कर्म-सिद्धान्त को सरल व संक्षिप्त शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया है यथा धेनुसहस्रेषु, वत्सो याति स्वमातरम् । तथा पूर्वकृतं कर्म, कर्तारमनुगच्छति ॥ ( महाभारत, 12/18/16) - जैसे हजारों गौओं के भीतर भी बछड़ा अपनी माता को खोज कर उसका अनुगमन करता है, उसी तरह किये हुए कर्म अपने कर्ता अनुगम करते हैं । उपनिषद् का ऋषि भी कर्म-व्यवस्था का निरूपण इस प्रकार करता है- पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा, पापः पापेनेति (बृहदा. उप. 3/2/13) - पुण्य कर्म से पुण्यात्मा, तथा पापकर्म से पापात्मा होता है । द्वितीय खण्ड 235
SR No.006297
Book TitleJain Dharm Vaidik Dharm Ki Sanskrutik Ekta Ek Sinhavlokan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSubhadramuni
PublisherUniversity Publication
Publication Year2008
Total Pages510
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size31 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy