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कर्म-फल सा नट
(सांस्कृतिक पृष्ठभूमिः)
कर्म अपने कर्त्ता का सदैव अनुगमन करते हैं। जैन दर्शन के अनुसार पांच शरीरों में एक शरीर है-कार्मण शरीर।कार्मण शरीर जीवात्मा के साथ पल-प्रतिपल प्रतिच्छाया की भांति लगा रहता है। इसे एक प्राकृतिक
ऑटोमेटिक रिकार्डर कहा जा सकता है। प्राणी के प्रत्येक कर्म का गणित इस शरीर में उट्टंकित/संगृहीत होता रहता है।
कर्म दो प्रकार के होते हैं- (1) शुभ कर्म और (2) अशुभ कर्म। शुभ या अशुभ कर्म समय के परिपाक के साथ अपना-अपना फल प्रदान करते हैं। सामान्यतः अशुभ कर्म सदैव अशुभ फल का प्रदाता होता है और शुभ कर्म सदैव शुभ फल प्रदान करते हैं। किसान द्वारा पृथ्वी में बोए हुए बीज विपरीत जल-वायु के कारण यदा-कदा निष्फल भी हो जाते हैं, लेकिन कृत कर्म कदापि निष्फल नहीं होते। भगवान महावीर ने स्पष्ट उद्घोषणा की थी
कडाण कम्माण ण मोक्ख अत्थि (उत्तरा. 4/3, 13/10)।
-अर्थात् कृत कर्मों से तब तक छुटकारा नहीं मिलता (जब तक कि अच्छे या बुरे फलों को भोग न लिया जाय)। अच्छे कर्मों का फल अच्छा, और बुरे कर्मों का फल बुरा ही मिलता है- जंजारिसं पुब्बमकासि कम्म, तमेव आगच्छति संपराए । (सूत्रकृतांग- 1/5/2/23)
-अर्थात् जीव ने जैसे कर्म किये होते हैं, उसी के अनुरूप
जन पालिका
की सांस्कृतिक एकता/2340