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पतितसे पावन
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(सांस्कृतिक पृष्ठभूमिः) भारतवर्ष में नारी को सम्मान देने की परम्परा रही है। अर्द्धनारीश्वर की जो मान्य अवधारणा है, उसमें नारी और पुरुष को एक ही परमेश्वर के समान भाग के रूप में मान्यता दी गई है। पुरुष के समान ही नारी को समान आदर व सम्मान दिया गया है। पारिवारिक व सामाजिक प्रगति-उन्नति में दोनों का समान योगदान है- यह निर्विवाद है है। वैदिक संस्कृति के सामाजिक स्वरूप के व्याख्याता मनु ने तो स्पष्ट व्यवस्था दी थी- यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः (मनुस्मृति- 3/56)। महाभारत - जो भारतीय संस्कृति का कोश है- में नारी-जाति के विषय में आदरपूर्ण विचार इस प्रकार व्यक्त किये गए हैं:
स्त्रियः साध्व्यो महाभागाः सम्मता लोकमातरः। धारयन्ति महीं राजन् इमां सवनकाननाम् ।
___(महाभारत, 13/43/19-20) - सती-साध्वी नारियां लोक की माता के रूप में आदरणीय हैं। हे राजन्! ये नारियां ही इस पृथ्वी को धारण किये हुए हैं- इन्हीं के कारण समस्त पृथ्वी टिकी हुई है।
अर्धं भार्या मनुष्यस्य भार्या श्रेष्ठतमः सखा। भार्या मूलं त्रिवर्गस्य, भार्या मित्रं मरिष्यतः ।।
(महाभारत, 1/68/40-41)
द्वितीय रवण्ड/221