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पूछा। “क्यों नहीं।” सुदर्शन ने कहा- “अर्जुन! सत्य तो यही है कि वे महाप्रभु तुम्हारे उद्धार के लिए ही यहां पधारे हैं। तुम मेरे साथ चलो। तुम्हारे भीतर संचित पाप-पंक को उनकी अमृत-देशना प्रक्षालित कर डालेगी ।"
सुदर्शन ने सहारा देकर अर्जुन को उठाया। दोनों चल पड़े प्रभु के दर्शनों के लिए। राजगृह की प्राचीरों से हजारों लोग यह दृश्य देख रहे थे । प्रभु-महिमा को देखकर हजारों हृदय गद्गद हो गए। छः माह से बन्द राजगृह के द्वार खुल गए ।
अर्जुनमाली महावीर के पास पहुंचे। महावीर की अमृतवर्षिणी वाणी में स्नान करके उन्हें शीतलता की अनुभूति मिली । सुदर्शन तो लौट आए पर अर्जुनमाली नहीं लौटे। उन्होंने मुनि-धर्म अंगीकार कर लिया । छः माह तक अर्जुन मुनि ने संयम का पालन किया। लोगों ने उन्हें भोजन के स्थान पर गालियां और प्रताड़ना दीं। अत्यन्त समताशील रहते हुए क्षमा भाव के जल से उन्होंने संचित पापों को धो डाला। छः माह में क्रोध से एकत्रित पापों को छः माह में ही क्षमा, तप और समता से नष्ट कर डाला । 'केवल ज्ञान' प्राप्त कर वे मोक्षाधिकारी बने । [ अन्त कृत् मूत्र से ]
[२]
मुलस कसाई
(जैन)
अढ़ाई हजार वर्ष पूर्व भगवान् महावीर इस धराधाम पर विचरण करते हुए जन-जन के मन की धरा पर अहिंसा और करूणा का वासन्ती वर्षण करते थे ।
एक बार भगवान् महावीर राजगृह नगर के बाहर गुणशीलक उद्यान में पधारे। राजगृह की जनमेदिनी भगवान् के दर्शनों के लिए उमड़ पड़ी । मगधदेश के महामंत्री अभयकुमार को जब भगवान् के पधारने की सूचना मिली तो वे अत्यन्त उत्साहित होते हुए नंगे पैरों ही प्रभु -दर्शन के लिए चल पड़े ।
द्वितीय खण्ड 205