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सकता। ज्ञान-प्राप्ति के लिए राजा श्रेणिक को राजसिंहासन से नीचे उतर कर चाण्डाल ज्ञानदाता को उस पर आसीन करना पड़ा था। ठीक ऐसा ही घटनाक्रम महाराज जनक और महर्षि अष्टावक्र के सम्बन्ध में वैदिक ग्रन्थों में वर्णित है। तीसरी कथा हनुमानजी द्वारा गीताज्ञान के श्रवण से सम्बन्धित है। उन्होंने वक्ता श्रीकृष्ण से ऊंचे आसन-अर्जुन के रथ की ध्वजा पर स्थिर रहकर गीता-पाठ श्रवण किया था। गुरु पद की मर्यादा का भंग हो जाने के कारण श्रीकृष्ण ने हनुमान्जी को पिशाच बनने का दण्ड दिया था।
तीनों कथाएं रोचक, सरस और गुरु की महिमा को एक स्वर में पुष्ट करती हैं।