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तुम अशोक वृक्ष के ऊपर चढ़े हुए रामकथा कह रहे थे। सीता तुम्हारी पूज्य थी, फिर भी चूंकि वह श्रोता थी, इसलिए नीचे बैठकर रामकथा सुन रही थी और तुम पुत्र होकर भी चूंकि वक्ता थे, अतः ऊपर बैठे कथा कह रहे थे।वैसी मर्यादा का पालन तुमने नहीं किया। उच्चासन से ज्ञान ग्रहण किया। यह महापाप तुमसे हुआ है।'
हनुमान् ने कहा-"तो प्रभो! इसका प्रायश्चित्त भी आप ही बताइए। मर्यादा की रक्षा के लिए भगवान् अपने भक्तों को भी दण्डित करते हैं। मर्यादा की रक्षा के लिए श्रीराम ने परम पवित्र सीता को भी वनवास दिया था।' श्रीकृष्ण बोले-"वक्ता से ऊंचे आसन पर बैठने के महापाप से परिशुद्ध होने के लिए तुम्हें पिशाच बनना पड़ेगा। जब तुम गीता पर भाष्य लिखोगे तो पिशाच योनि से मुक्त हो जाओगे।' कहते हैं, गीता का हनुमदभाष्य हनुमान जी ने पिशाच योनि से मुक्ति के लिए लिखा था।
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भारतीय संस्कृति की दोनों प्रमुख विचारधाराओं-वैदिक व जैन के पुरोधा आचार्यों ने 'गुरु की महत्ता' को एक स्वर से स्वीकारा है और उसे व्यावहारिक जीवन में उचित सम्मान देने की अनिवार्यता को भी रेखांकित किया है। भारतीय संस्कृति की उक्त व्यावहारिक शिक्षा का समर्थन उपर्युक्त कथानकों में समान रूप से अभिव्यक्त हो रहा है।
कथाओं के घटना-प्रसंग सर्वथा भिन्न हैं, पर सभी का हार्द और कथ्य एक ही है। वह यह है कि गुरु यदि चाण्डाल और नीच वर्ण का भी हो तथा शिष्य या श्रोता राजा हो तो भी वह राजसिंहासन पर बैठकर विद्या प्राप्त नहीं कर