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प्रद्धा का चमवार
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(सांस्कृतिक पृष्ठभूमिः)
श्रद्धा यदि अडोल-अकंप हो तो अपूर्व चमत्कार घटता है। श्रद्धा के प्रदीप में यदि धैर्य का घृत डाला जाए तो दिव्य आलोक का जन्म होता है। श्रद्धा परम शक्ति स्वरूपा है। उस के बल पर आत्मा परमात्मा को और नर नारायण को अवतरित कर लेता है। असंभव संभव हो जाता है।
श्रद्धा की महत्ता व उपयोगिता के समर्थन में भारतीय संस्कृति की अंगभूत सभी विचारधाराओं में प्रचुर प्रमाण उपलबध हैं। श्रद्धा का सम्बन्ध मनुष्य के हृदय-पक्ष से है। उपनिषद् के ऋषि का कथन है- हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवति। (बृहदा. उप. 3/9/21)। अर्थात् श्रद्धा हृदय में प्रतिष्ठित होती है। तर्कशील मस्तिष्क से वह उत्पन्न नहीं होती। श्रद्धा का विषय इसीलिए 'अतर्क्स' होता है। इसीलिए श्रद्धा से जुड़े और विशिष्ट प्राणियों द्वारा विशिष्ट परिस्थितियों में अनुभूत चमत्कारों की भी तार्किक दृष्टि से व्याख्या प्रायः संभव नहीं हो पाती। श्रद्धा के लौकिक व आध्यात्मिक उपलब्धियों के विषय में वैदिक परम्परा में उपलब्ध कुछ उद्धरण यहां प्रासंगिक हैं:
श्रद्धया सत्यमाप्यते (यजुर्वेद, 19/30)। - श्रद्धा से 'सत्य' का साक्षात्कार या उसकी उपलब्धि होती है। श्रद्धया विन्दते वस (ऋग्वेद, 40/151)। - श्रद्धा से लक्ष्मी मिलती है।
नाम
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को सरकार IIT