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भक्त हृदयों से उठी प्रार्थनाएं सदैव स्वीकृत होती हैं। श्रीकृष्ण विदुर की कुटी के समक्ष पहुंच गए। विदुरानी अनन्त हर्ष से आह्लादित हो उठी। हर्ष के तीव्र वेग ने उसकी समझ को कुण्ठित कर दिया। वह भान भूल गई उसे क्या करना चाहिए, कुछ ज्ञात न रहा।
“बूआ! मैं भूखा हूं।कुछ खाने को दो।" द्वार पर खड़े श्रीकृष्ण ने विदुर-पत्नी की श्रद्धा-तन्द्रा को तोड़ा।
___ "आइए, वासुदेव! पधारिए! विराजिए!" विदरपत्नी ने एक पटड़ी रख दी। श्रद्धा के आवेश में उसे इतना भी भान नहीं था कि पटड़ी उल्टी है या सीधी । श्रीकृष्ण उलटी पटड़ी पर बैठ गए।
विदुर-पत्नी ने इधर-उधर देखा । केलों के अतिरिक्त वहां कुछ भी खाद्य-सामग्री न थी। उसने केले उठाए और श्रीकृष्ण के समीप धरा पर बैठ गई। वह स्वयं केले छीलने लगी। उसने केले की गरी को नीचे डाल दिया और छिलका श्रीकृष्ण के फैले हुए हाथ पर धर दिया। श्रीकृष्ण भी विदूरानी के हृदय से उठे भक्ति के तेज प्रवाह में बह गए। उन्हें भी यह भान नहीं रहा कि वे क्या खा रहे हैं।
भक्तिन भक्ति-सागर में डूबी हुई केले के छिलके खिलाती रही और भगवान् खाते रहे। खिलाने वाली को यह ज्ञात नहीं था कि वह क्या खिला रही है और खाने वाले को भी सुध नहीं थी कि वह क्या खा रहा है। दोनों प्रेमदान तथा प्रेम-सुधापान में तन्मय थे।
अकस्मात् विदुर जी आ गए। उन्होंने उल्टी पीढी पर बैठे केले के छिलके खाते श्रीकृष्ण को देखा। वे स्तंभित हो गए। उन्होंने पत्नी को डांटा- “क्या कर रही हो? श्रीकृष्ण को केले के छिलके खिला रही हो?"
सैकड़ों ग्रामवासियों के समक्ष धनी सेठ लज्जित हो गया। गुरु नानक देव ने कहा- "मेरे अस्वीकार का कारण स्पष्ट हो चुका है। तुम्हारा भोजन अन्याय से अर्जित धन से तैयार हुआ है। और इस निर्धन का भोजन श्रम और न्याय से निष्पन्न है। इसलिए तुम्हारा भोजन मेरे लिए बेस्वाद और अग्राह्य है। श्रम-संचित अन्न से तैयार इस निर्धन का भोजन रूखा- सूखा होते हुए भी मेरे लिए अमृत है। इस निर्धन के प्रेम और भक्ति ने इस रूक्ष भोजन को अमृत बना दिया है।"
___ "सेठ! अहंकार अमृत को भी विष बना देता है। प्रेम विष को भी अमृत में बदल देता है।" सेठ को सत्य की पहचान मिली। उसका धन निर्धन के धन-प्रेमधन के समक्ष पराजित हो गया था।
जनम तालिम की समस्कीन ना
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