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विमित हो गए। प्रभु ने चन्दनबाला पर दृष्टिपात किया । प्रभु की कृपादृष्टि पाकर चन्दनबाला कृतकृत्य हो उठी । उसकी रोमराजी खिल उठी । प्रेमाश्रु उसके नेत्रों में मचलने लगे । तप के सुमेरू तीर्थंकर महावीर ने अपनी कराञ्जलि चन्दनबाला के समक्ष फैला दी। प्रेम और श्रद्धा के सुमेरू से चन्दनबाला ने महावीर को उड़द बाकुलों का दान दिया ।
अहोदानं - अहोदानं के दिव्य उद्घोषों से दिग् - दिगन्त गूंज उठे । उड़द बाकुलों को परमान्न की भांति ग्रहण करके तीर्थंकर महावीर ने पांच महीने पच्चीस दिन के दीर्घ उपवास को विराम दिया।
प्रेम-श्रद्धा का प्रसाद - उड़द बांकुले भी परमान्न हो सकते हैं। यही दर्शन छिपा है चन्दना और महावीर के इस प्रसंग में । चन्दना ने मुहादायी को स्वयं में अवतारा तथा महावीर ने मुहाजीवी होकर उस प्रेमभिक्षा को ग्रहण किया। [आवयक चूर्णि आदि से]
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शबरी के बेर (वैदिक)
श्री राम के चरणों की अनुरागिनी शबरी भील कन्या थी । निम्न कुल में उत्पन्न होकर भी वह उच्च विचारों वाली महिला थी । अधर्म में लिप्त अपने परिवार का त्याग करके शबरी जंगलों में रहकर भगवान् के भजन में तल्लीन रहने लगी ।
जाति
वह युग छूतछात का युग था। अस्पृश्यता का बोलबाला था । मनुष्य से बड़ी मानी जाती थी । निम्न कुल में उत्पन्न शबरी को उच्च में उत्पन्न लोगों की घृणा का शिकार होना पड़ा था । जंगल में यत्र-तत्र ऋषियों के आश्रम थे । उन आश्रमों से दूर एकान्त में एक पर्णकुटी बनाकर शबरी रहने लगी। उसके हृदय में भगवत्-स्मरण के साथ-साथ सन्त- -सेवा का भी भाव था । अपनी श्रद्धा - पूर्ति के लिए उसने एक मार्ग निकाला - वह प्रतिदिन उस मार्ग को साफ-स्वच्छ कर देती जिस पर से चलकर ऋषिजन खानार्थ जाते थे। सूखी लकड़ियों के गट्ठर वह ऋषि आश्रमों के निकट रख जाती थी । लेकिन यह सब कार्य करते हुए वह अपने को छिपा कर रखती ।
द्वितीय खण्ड 22