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तेज करने के लिए यन्त्र द्वारा खाल के गुब्बारे में हवा भरता और निकालता है। वह खाल श्वास तो लेती है पर प्राणविहीन होती है, वैसे ही प्रेमरहित मनुष्य केवल श्वास लेता है। वह मृत तुल्य है।
प्रेम परम आधार है। प्रेम के बिना समस्त क्रियाएं निःसार हैं। क्रिया में हृदय-रस, प्रेम रस के संचार में ही अलौकिकता घटित होती है। प्रेम, श्रद्धा और भक्ति हृदय के तल पर समानार्थी शब्द हैं। या यों कहें कि श्रद्धा और भक्ति पराकाष्ठा पर पहुंचकर प्रेम रूप में रूपान्तरित होती हैं। प्रेम की इस परम महिमा को संसार के समस्त धर्मों और महापुरुषों ने एक स्वर से स्वीकार किया है। वैदिक ऋषि की उद्घोषणा है- प्रियं प्रियाणां कृणवाम (अथर्व. 12/3/49)- अर्थात् हम अपने प्रिय व्यक्तियों का हित करें। परस्पर-प्रेम से बंधे व्यक्तियों के समाज में सभी एक दूसरे के हित-साधन में तत्पर होते हैं। फलस्वरूप वह समाज निरन्तर प्रगति व विकास के पथ पर अग्रसर होता है। भक्ति मार्ग तो विशुद्ध ईश्वरीय प्रेम का ही पर्याय है। यह विशुद्ध भक्तिमय प्रेम अनिर्वचनीय होता है- उसे शब्दों में पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। नारद भक्तिसूत्र में कहा गया है- अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम् मूकास्वादनवत् (नारदभक्तिसूत्र, 51-52)। भक्ति या ईश्वरीय प्रेम भक्त व ईश्वर को एकसूत्र में जोड़ता है। इस प्रसंग में भागवत पुराण का यह पद्य मननीय है जो स्वयं भगवान् की स्वीकारोक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है:
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज। साधुभिस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥
(भागवत पु. 9/4/63) -मैं भक्तजनों का प्रिय हूं और मुझे भी भक्त जन प्रिय हैं। इसलिए मैं भक्तों के अधीन होकर पूर्णतया परतन्त्र हो जाता हूं। मेरा हृदय भक्त साधुओं के वश में रहता है।
बौद्ध परम्परा में भी सुख-शान्ति का मूल 'प्रीति' को माना गया है
का च भिक्खवे सुखस्स उपमिसा? पस्सद्धी। का च भिक्सवे पस्सद्धिया उपनिसा? पीती।
(संयुत्तनिकाय, 2/12/23)
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