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क्षान्तिपरः, स साधयत्युत्तमं धर्मम् (प्रशमरति प्रकरण,168)। आचार्य कुन्दकुन्द के अनुसार क्षमा-मंडित मुनि समस्त कर्मों का क्षय करने में सक्षम होता है- पावं खमइ असेसं खमाय पडिमंडिओ य मुणिपवरो (भावपाहुड. 108)। क्षमा-भाव की साधना से भ्रष्ट व्यक्ति अपने क्रोध के कारण वैर-विरोध के वातावरण को बढाता हुआ सभी महाव्रतों व सद्गुणों को विध्वस्त कर देता है (द्रष्टव्यः प्रश्नव्याकरण. 2/2 सू. 123)/तथागत बुद्ध ने क्षमा को परम तप की संज्ञा देते हुए कहा
खन्ति परमं तपो तितिक्खा। (धम्मपद. 14/6) -क्षमा (सहिष्णुता) परम तप है। महात्मा बुद्ध का स्पष्ट विचार थान हि वेरेण वेराणि सम्मन्तीध कदाचनं। अवेरेण च सम्मन्ती एस धम्मो सनन्तनो॥ (धम्मपद. 1/5)
-वैर से वैर कभी शान्त नहीं होता। अवैर (क्षमा आदि) से ही वैर शान्त होता हैं- यही शाश्वत नियम है।
वैदिक परम्परा में भी क्षमा को महनीय स्थान दिया गया है। वैदिक ऋषि की स्पष्ट उद्घोषणा है-मा विद्विषावहै (तैत्तिरीयोपनिषद्, 8/2)।
महर्षि वाल्मीकि ने क्षमा को सर्वोच्च पद प्रदान करते हुए उद्घोषणा की
क्षमा दानं क्षमा सत्यं क्षमा यज्ञश्च पुत्रिकाः। क्षमा यशः क्षमा धर्मः क्षमयाविष्टितं जगत् ॥
(वा.रामा. बालकाण्ड 33/9) -क्षमा ही दान है। क्षमा ही सत्य है। क्षमा ही यज्ञ है। क्षमा ही कीर्ति है। क्षमा ही धर्म है। सारा जगत् क्षमा से ही अधिष्ठित है। .
महाभारतकार महर्षि व्यास के शब्दों में क्षमा तेजस्वियों का तेज है और 'ब्रह्म' है- क्षमा तेजस्विनां तेजः, क्षमा ब्रह्म तपस्विनाम् (महाभारत, 3/29/40)। क्षमावान् सर्वत्र शान्ति व मैत्री के वातावरण का संवर्धन करता है। इसके विपरीत, वैर से वैर शान्त नहीं होता, अपितु उसी तरह बढता है जैसे घी से आग बढ़ती ही है- न वापि वैरं वैरेण केशव व्युपशाम्यति। हविषाऽनिर्यथा कृष्ण भूय एवाभिवर्धत (महाभारत, 5/ 72/63-64)। क्षमा धर्म को प्राणवन्त करने वाले कुछ महान् पुरुषों के जीवन के वे पल यहां चित्रित किए गए हैं जब उन्होंने स्वयं को कष्ट देने