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सम्बन्ध में स्पष्ट निर्देश उत्तराध्ययन सूत्र में दिया गया है। वहां एक जिज्ञासु व्यक्ति पूछता है- भंते! वैयावृत्त्य (सेवा) से क्या लाभ होता है? भगवान् ने उत्तर दिया हैवेयावच्चेणं जीवे तित्थयरनामगोयं कम्म निबन्धइ ।
(उत्तरा. 29/44) अर्थात् वैयावृत्त्य (सेवा) से व्यक्ति तीर्थंकर पद को प्राप्त करता है। सेवा की उक्त उपलब्धि इसकी महनीयता को स्वतः रेखांकित करती है। उत्तराध्ययन सूत्र में वृद्ध-सेवा को मोक्ष का मार्ग भी बताया गया है (द्र. उत्तरा. सू. 32/3) जैन साहित्य में यह भी निरूपित किया गया है कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने अपने किसी पूर्वभव में जीवानन्द वैद्य के रूप में एक मुनि तपस्वी की रोगोपचार-सेवा का पुनीत कार्य किया था।
बौद्ध परम्परा के ग्रन्थ धम्मपद में भी वृद्ध-सेवा का फल इस प्रकार बताया गया है:
अभिवादनसीलिस्स निच्चं बुद्धापचायिनो। चत्तारो धम्मा बड्ढन्ति आयु वण्णो सुखं बलं ।
(धम्मपद. 8/10) अर्थात् अभिवादनशील व वृद्धसेवी व्यक्ति, अधिक आयु, कीर्ति, सुख व बल को प्राप्त करता है।
जैन और वैदिक वांग्मय से चुने गए कुछ कथानक यहां प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें सेवा का एक जैसा माहात्म्य स्पष्ट निरूपित हुआ है।
[१] नन्दीषेण मुनि
(गैन)
नन्दीषेण ब्राह्मण-पुत्र थे। पूर्वजन्म के पापों के फलस्वरूप, वे अत्यन्त विरूप/कुरूप थे। सभी उनसे घृणा करते थे। कोई उन से बात तक नहीं करना चाहता था। बचपन में ही उनके माता-पिता का देहान्त हो गया था। वे मामा के यहां रहते थे। वे वहां घर का सारा काम करते तथा दिन भर खेतों पर पशुओं को चराते थे।
द्वितीय रखड/143