________________
उ
ल
सेवा है परम धर्म
(सांस्कृतिक पृष्ठभूमिः)
सेवा परम धर्म है। सेवा धर्म की गहराई की बड़े-बड़े योगीजन भी थाह नहीं पा सके । सेवा धर्म में समर्पित सेवक स्वयं के सुख और प्रसन्नता को विस्मृत करके सेव्य के सुख के लिए आत्मोत्सर्ग तक कर देता है। उसके लिए सेव्य की सेवा ही शेष रह जाती है, शेष अशेष हो जाता है। उसके हृदय की घृणा और ग्लानि सदा-सदा के लिए विनष्ट हो जाती है। उसका स्वत्व सेवा भाव की पुनीत यज्ञ-अग्नि में स्वाहा हो जाता है। सेव्य में ही उसका स्वत्व सिमट जाता है । स्वत्व का परित्याग इस जगत् की सर्वोच्च साधना है। चूंकि सेवा में स्वत्व का परित्याग प्रथम और अनिवार्य शर्त है, इसलिए सेवा धर्म अतिकठिन है । प्रसिद्ध नीतिकार भर्तृहरि ने कहा है
सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ।
(नीतिशतक, 52 )
'सेवा धर्म परम गहन है और योगीजनों के लिए भी यह अगम्य है- अर्थात् इसकी गम्भीरता को वे भी नहीं समझ सकते।' संत कवि तुलसीदास ने भी सेवा को अतिकठिन धर्म बताया है
अगम निगम प्रसिद्ध पुराना । सेवा धरमु कठिन जगु जाना ॥
द्वितीय खण्ड 141