________________
प्राणिमात्र पर 'करुणा' या 'अनुकम्पा' का भाव मानवता की पहचान है। निर्दयता तो व्यक्ति की पशुता या राक्षसी वृत्ति को ही प्रतिबिम्बित करती है। विशेषकर, धार्मिक आराधना में अग्रसर व्यक्ति के लिए तो करुणायुक्त व अहिंसक होना अत्यन्त आवश्यक है। उक्त वैचारिक स्वर उपर्युक्त दोनों कथानकों में समान रूप से अनुगुंजित हुआ है।
प्रस्तुत कथानकों में से एक में वैदिक परम्परा की शबरी भक्तिमार्ग की पथिक है तो दूसरे में जैन परम्परा के अरिष्टनेमि वीतराग-मार्ग के पथिक हैं। दोनों की ही मंजिल परमपद व मुक्ति प्राप्त करना है।
वैवाहिक जैसे मांगलिक अवसर पर मूक प्राणियों के प्रति करुणार्द्र रहने और प्राणि-रक्षा को महत्त्व देते हुए विवाह से भी विरत हो जाने की जागरूक मानसिक स्थिति को दोनों कथानकों के प्रमुख पात्रों में समानतया देखा जा सकता है। निष्कर्षतः दोनों विचारधाराओं के साझे आदर्श वाक्य 'अहिंसा परमो धर्मः' को इन दोनों कथानकों में व्याख्यायित किया गया है।
जैन धर्म एवं दिक धर्म की सास्कृतिक एकता/1400