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संभाले। लेकिन अरिष्टनेमि के हृदय में न तो राज्य की कामना थी और न ही भोगेच्छा । साधना के मार्ग पर बढ़ने के लिए वे उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। .. माता शिवादेवी ने अरिष्टनेमि में सांसारिक आकर्षण उत्पन्न करने का दायित्व श्रीकृष्ण को सोंपा। श्रीकृष्ण ने यह दायित्व अपनी रानी सत्यभामा को सोंप दिया। सत्यभामा ने वाग्जाल में उलझा कर कुमार अरिष्टनेमि से विवाह की स्वीकृति ले ली।
श्रीकृष्ण ने यह सुसंवाद माता-शिवादेवी को सुनाया। शिवादेवी का मातृहृदय प्रसन्नताओं से चहक उठा । श्रीकृष्ण ने जूनागढ़-नरेश उग्रसेन से उनकी पुत्री राजुल का हाथ अपने भाई अरिष्टनेमि के लिए मांगा। उग्रसेन ने श्रीकृष्ण की याचना को स्वीकार कर लिया। राजुल ने कुमार अरिष्टनेमि को मन ही मन अपना पति स्वीकार कर लिया।
श्रीकृष्ण ने अरिष्टनेमि के विवाह की तैयारियां कराईं। सुनिश्चित शुभ मुहूर्त में यादवों की बारात जूनागढ़ के लिए प्रस्थित हुई। बारात में असंख्य यादवकुमार सम्मिलित हुए थे। इस अभूतपूर्व बारात का नेतृत्व स्वयं वासुदेव श्रीकृष्ण कर रहे थे। आकाश में देवताओं के समूह एकत्र थे। इस बारात को देखने के लिए दुलहे के रूप में कुमार अरिष्टनेमि एक विशाल और सुसज्जित भव्य रथ पर सवार थे। बाजे बज रहे थे। मस्त यादव हुंकारें भर रहे थे।
बारात जूनागढ़ केद्वार तक पहुंची। तोरण द्वारों में यादवों के घोड़े और रथ प्रवेश कर रहे थे। स्वयं को सहेलियों में छिपाती हुई राजुल भी अरिष्टनेमि की एक झलक पाने के लिए एक अट्टालिका के झरोखे में आकर खड़ी हो गई थी। भारी कोलाहल था। कोलाहल को चीरती हुईं कुछ करुण आवाजें कुमार अरिष्टनेमि के कानों में पड़ीं। अरिष्टनेमि के लिए शेष कोलाहल थम गया, केवल करुण चीत्कारें वे सुनने लगे। उनका करुणा रस से भीगा हृदय हिल गया। उन्होंने रथचालक से कहा-"रथ रोक लो, सारथि! इन करुण चीत्कारों का क्या रहस्य है, मुझे बताओ।"
"मांसाहारी यादवकुमारों के लिए मूक पशुओं को बाड़े में बन्द किया गया है।" सारथी ने उत्तर दिया- “मृत्यु-भय से कांपते उन्हीं पशुओं की चीत्कारें आप सुन रहे हैं कुमार।"
दिशीय नाण्ड 137