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प्रस्तुत किये गये हैं। इस प्रसंग में इस तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता है कि वैदिक व जैन- दोनों ही संस्कृतियों में एक से दूसरी में कथानकों का आदान-प्रदान होता रहा है। प्रत्येक संस्कृति के पुरोधा आचार्यों/मनीषियों/चिन्तकों व साहित्यकारों ने उक्त आदान-प्रदान में अपनी रुचि इसलिए दिखाई कि वे उक्त कथानकों में भारतीय संस्कृति की उन मौलिक उदात्त भावनाओं को प्रतिबिम्बित होता देख रहे थे जो उक्त दोनों संस्कृतियों में एक साझी विरासत के रूप में चिर काल से चली आ रही थीं। किस संस्कृति या विचारधारा ने किस अन्य संस्कृति या विचारधारा से कथानक लेकर उसे अपने अनुरूप ढाला- यह जानना बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है। महत्त्वपूर्ण यह है कि दोनों विचारधाराओं की किस चिरन्तन सत्य या आदर्श सिद्धान्त के प्रचार-प्रसार में रुचि रही है-इसे हम जानें-समझें और जीवन में उसे क्रियान्वित करें। साथ ही इस तथ्य से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि दोनों ही कथानक अपनी-अपनी परम्परा में सत्य व ऐतिहासिक हों।