________________
कवयो वचोभिरेकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति।
(ऋग्वेद- 1/114/5) एक ही सत्य को कवि (विद्वान्) लोग अनेक प्रकारों से व्याख्यायित करते हैं (अर्थात् विद्वानों के विविध व्याख्यानों में एक ही सत्य अनुस्यूत है- ऐसा समझना चाहिए)।
स्मृतिकार मनु
एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥
(मनुस्मृति- 12/123) -एक ही तत्त्व को कुछ लोग अग्नि कहते हैं तो कुछ मनु । कुछ उसे प्रजापति कहते हैं तो कुछ उसे इन्द्र कहते हैं। कुछ लोग उसे ही प्राण तत्त्व तो कुछ उसे शाश्वत ब्रह्म नाम से पुकारते हैं।
महर्षि व्यास धर्मं यो बाधते धर्मः, न स धर्मः कुधर्म तत्।
. (महाभारत-3/131/11) जो धर्म दूसरे धर्म को बाधा पहुंचाता है, वह धर्म नहीं, कुधर्म है (अर्थात् अन्य धर्मों/विचारधाराओं के साथ विरोध न रखना 'धर्म' का धर्मपना है)।
महाकवि कलिदास बहुधाऽप्यागमैर्भिन्नाः पन्थानः सिद्धिहेतवः । त्वय्येव निपतन्त्यौघाः, जान्हवीया इवार्णवे॥
(रघुवंश-1/26) - जैसे गंगा की विविध धाराओं का लक्ष्य समुद्र ही होता है, वैसे ही विविध आगमों/शास्त्रों में विभक्त समस्त (दार्शनिक) विचारधाराएं परमात्म-तत्त्व पर ही केन्द्रित व अन्त में वहीं समाहित होती हैं (अर्थात् विविधं दर्शनों का लक्ष्य एक ही है)।
नाम एवेदिक धर्म की सागतिक MI/1184