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(समन्वय के मुखरित स्वर)
अन्य धर्मों, दर्शनों व विचारधाराओं के प्रति सहिष्णुता व उदारता का भाव रखना, परस्पर समन्वय की दृष्टि से समानता के सूत्र खोजना, वैचारिक विविधताओं में अनुस्यूत विचारधारा को रेखांकित करना- यह भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता रही है। इस विशेषता को अविच्छिन्न बनाये रखने में, वैदिक व जैन परम्पराओं के ऋषियों-मुनियों, आचार्यों, मनीषियों द्वारा यथासमय अभिव्यक्त उद्गार मार्गदर्शक रहे हैं। उनमें से कुछ विशिष्ट वचनों/ सन्दर्भो को यहां उपसंहार रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है:वैदिक ऋषि एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
__ (ऋग्वेद-1/164/46) - सत्य एक है, विद्वान् लोग उसे अनेक प्रकारों से व्याख्यायित करते हैं।
तदेवानिस्तदादित्यस्तद् वायुस्तदु चन्द्रमाः। तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः॥
(यजुर्वेद- 32/1) तत्त्व एक ही है। उसी को अग्नि, आदित्य, वायु, चन्द्रमा, शुक्र, प्रजापति व ब्रह्म- इन नामों से पुकारते हैं। संगच्छध्वं संवदध्वम्।
(ऋग्वेद-1/191/2) -चलने-फिरने (व्याहारिक आचरण) में तथा परस्पर बोलचाल में हमारी सहभागिता हो। सं वो मनांसि जानताम्।
(ऋग्वेद 1/191/2) एक दूसरे के विचारों को मिलकर (सहमत होकर) जानेंसमझें।
संगम
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