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विद्यादेवियां सोलह मानी गयी हैं। उनके नाम इस प्रकार बताए गए हैं:
1. रोहिणी, 2. प्रज्ञप्ति, 3. वज्रश्रृंखला, 4. वज्रांकुशा, 5. जाम्बूनदा, 6. पुरूषदत्ता, 7. काली, 8. महाकाली, 9. गौरी, 1. गांधारी, 11.ज्वालामालिनी, 12. मानवी, 13. वैरोटी, 14. अच्युता, 15. मानसी और 16. महामानसी।
परम्परा-भेद से पांचवीं विद्यादेवी को अप्रतिचक्रा या चक्रेश्वरी नाम से भी अभिहित किया गया है। अभिधानचिन्तामणि में चक्रेश्वरी नाम से और पद्मानन्द महाकाव्य में अप्रतिचक्रा नाम से उसका उल्लेख मिलता है। आठवीं विद्यादेवी का नाम हेमचन्द्र ने 'महापरा' बताया है, परम्परा-भेद से अन्य ग्रन्थ उसे महाकाली कहते हैं। ज्वालामालिनी का उल्लेख कुछ ग्रन्थों में 'ज्वाला' नाम से मिलता है। उन्हीं ग्रन्थों में वैराटी को वैरोट्या और अच्युता को अच्छुप्ता कहा गया है।
विद्यादेवियों की सूची का शासन-देवताओं की सूची से मिलान करने पर विदित होता हैं कि इन देवियों में से प्रायः सभी को शासन यक्षियों की सूची में स्थान प्राप्त है यद्यपि शासन-यक्षी के रूप में इनके आयुध, वाहन आदि भिन्न प्रकार के बताए गये हैं।
(7) बहुमान के पात्रः देव-देवियां
कृतज्ञता व प्रत्युपकार-भावना, कल्याणकारी के प्रति बहुमान व आस्था का प्रदर्शन- ये भारतीय सांस्कृतिक क्षेत्र में सर्वत्र मुखरित रहे हैं। जन-जीवन में जो भी पदार्थ या व्यक्ति सार्वजनिक दृष्टि से उपयोगी हैं, कल्याणकारी हैं, उनके प्रति बहुमान एवं भक्ति-भावना का प्रदर्शन करना प्रत्येक भारतीय का सहज स्वभाव रहा है। उक्त प्रवृत्ति ने अनेक देवी-देवताओं को आराध्य कोटि में ला दिया है। वैदिक काल में अग्नि, वायु, वरूण, सूर्य, चन्द्र
बन
दिक धर्म की सामति
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