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आई हो। यह भी हो सकता है कि पहले एक ईश्वर की अवधारणा मान्य हुई हो, बाद में उसके अंशभूत या सहायक शक्तियों के रूप में विविध देव-देवियों की अवधारणा उद्भूत हुई हो। उक्त अवधारणाओं में 'अवतारवाद' की अवधारणा जुड़ी तो देववाद के नये आयामों का उद्घाटन हुआ।
वैदिक काल में प्राकृतिक पदार्थों-सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वरुण, वायु आदि- में देव-शक्तियों का निवास मानकर उनकी अनुकूलता हेतु प्रार्थना-उपासना की जाती थी। वैदिक मन्त्रों में उक्त तथ्य स्पष्ट प्रतिबिम्बित होता है। उन शक्तियों की एक नियामक परम शक्ति भी निर्धारित हुई।
उपनिषद् काल तक आते-आते एक सर्वव्यापक परम तत्त्व 'ब्रह्म' की अवधारणा पूर्णतया विकसित व प्रतिष्ठित हो चुकी थी। सृष्टिप्रक्रिया के घटक-विराज, हिरण्यगर्भ, ईश्वर-इन तीन देवों, और पौराणिक काल में ब्रह्मा-विष्णु-महेश- इन तीन देवों को मुख्यता प्राप्त हुई।
स्वर्ग-नरक रूपी पारलौकिक अस्तित्व की मान्यता से जुड़ी स्वर्गवासी देवों की अवधारणा प्रकाश में आई।शरीर के अन्दर भी प्राण आदि दैवी-शक्तियों तथा उनके अधिष्ठाता 'आत्मा' देव की सत्ता को भी स्वीकारा गया। समस्त जीवात्माओं की समष्टिभूत 'परमात्मा' की अवधारणा को भी मान्यता मिली। समन्वयवादी धारा में ब्रह्म व परमात्मा- इन दोनों की एकता स्थापित कर एक समन्वित देव-शक्ति की अवधारणा जन्मी।
उपनिषद् में सर्वचराचरव्यापी 'परब्रह्म' रूप-रस-गन्ध स्पर्श रहित व निर्गुण तत्त्व के रूप में (द्रष्टव्यः कठोपनिषद्- 1/3/15, श्वेताश्वतरोपनिषद्- 4/2, मुण्डकोपनिषद् 1/1/6, 2/17, 2/2/11, मांडूक्योपनिषद्- 7 आदि) व्याख्यायित हुआ है। समस्त जीवों के शरीर में स्थित 'सर्वभूतान्तरात्मा' रुपी एक समष्टि चैतन्य का भी निरूपण उपनिषद् में प्राप्त होता है। (कठोपनिषद्-2/2/9-13)।