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शिक्षा-प्राप्ति के लिए एक अनुकूल व मधुरिम वातावरण की भूमिका निर्मित होती है और गुरु-शिष्य के मध्य पिता-पुत्रवत् सम्बन्ध की नींव रखी जाती है।
दिगम्बर जैन परम्परा में 'उपनीति क्रिया' पूर्वोक्त वैदिक संस्कार उपनयन जैसी ही है। वैदिक परम्परा की तरह, जैन पुराणों में ब्रह्मचारी शिष्य के लिए यज्ञोपवीत पहनने का भी विधान किया गया है (द्र. आदिपुराण-39/94-95, 59-167, हरिवंश पुराण42/5, पद्मपुराण-19/81-82)।इस यज्ञोपवीत को 'रत्नत्रय' (मोक्ष-मार्ग) का प्रतीक माना जाता था। इस 'उपनीति क्रिया' से पूर्व, लिपिसंख्यान क्रिया भी की जाती है जो अक्षरारम्भ की विधि का सूत्रपात प्रस्तुत करती है। उपनीति क्रिया के साथ 'व्रतचर्या क्रिया' का भी जैन परम्परा में विधान है। ब्रह्मचारी शिक्षार्थी को कठोर व्रत धारण करने पड़ते हैं। व्रतचर्या क्रिया के माध्यम से व्रतसंयममय जीवन स्वीकार करने का दृढ संकल्प अभिव्यक्त होता हैं।
(7) समावर्तन व व्रतावतरण
वैदिक परम्परा के समावर्तन संस्कार को स्नान संस्कार भी कहा जाता है । वेदाध्ययन के बाद ब्रह्मचारी स्नान करता था। यह स्नान गुरु के आदेश पर ही किया जाता था। इस प्रकार स्वान किये गये व्यक्ति को 'स्नातक' कहा जाता था। स्नातकों की तीन कोटियां थीं:- विद्यास्नातक, व्रतस्नातक, विद्याव्रतस्नातक । समावर्तन का अभिप्राय ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति के बाद गृहस्थ आश्रम में प्रेश करना । लेकिन नैष्ठिक ब्रह्मचारी होते हैं वह जीवनपर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और गुरु के समीप ही रहते हैं। उनका समावर्तन संस्कार नहीं होता, लेकिन अन्य ब्रह्मचारी समावर्तन संस्कार के साथ गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हैं।
प्रथम खण्ड.87